हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , 24 अप्रैल 2026 को इज़राइली अखबार "हार्ट्ज़" में प्रकाशित एक साक्षात्कार ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय हलकों में सियोनवाद की भूमिका पर गरमागरम बहस छेड़ दी है। इस साक्षात्कार का केंद्र वह शख्सियत हैं जो प्रलय (यहूदियों के साथ नाजियों के अत्याचार) के इतिहास की सबसे विश्वसनीय शोधकर्ताओं में गिनी जाती हैं।
बार्टोव ने अपनी नवीनतम पुस्तक में सियोनी परियोजना का गहरा आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, सियोनवाद अपने ऐतिहासिक और राजनीतिक विकास में फिलिस्तीनियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाइयों पर उतर आया है जो स्पष्ट रूप से नरसंहार की प्रकृति रखती हैं।
उनका कहना है कि यह कोई अस्थायी या आकस्मिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सियोनी सिद्धांत और राजनीतिक ढांचे की जड़ में मौजूद है, जिसने दशकों तक इस प्रवृत्ति को दिशा दी।
बार्टोव ने सियोनवाद को एक ऐसी राजनीतिक परियोजना के रूप में आलोचना का निशाना बनाया जो अंततः एक दमनकारी, नस्लीय वर्चस्ववादी, अंधराष्ट्रवादी और जबरदस्ती वाले सिस्टम में बदल गया है। उनका कहना है कि इस सिस्टम की नींव संरचनात्मक हिंसा, व्यवस्थित निष्कासन और फिलिस्तीनियों के मौलिक अधिकारों के लगातार उल्लंघन पर रखी गई है।
इस साक्षात्कार के बाद प्रतिक्रियाएँ तत्काल और तीव्र द्विध्रुवीय थीं एक ओर वे लोग थे जो बार्टोव के इस खुलासे को देर से आने वाला और अत्यंत आवश्यक बताते हैं, एक ऐसा खुलासा जो इज़राइली नीतियों के असली चेहरे से पर्दा उठाता है। दूसरी ओर वे लोग थे जो उसी सिद्धांत के कट्टर रक्षक हैं और नस्लीय भेदभाव, कब्जे और अधिकारों के उल्लंघन के बावजूद उसे वैध ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।
बार्टोव का यह खुलासा ऐसे वैश्विक माहौल में हुआ है जो पहले से ही इज़राइली कब्जे की नीतियों के खिलाफ गुस्से और विरोध से भरा हुआ है। अब कब्जे की शर्तें और अर्थ बिना किसी चुनौती के स्वीकार नहीं किए जाते, बल्कि खुली और निडर आलोचना का केंद्र बन चुका हैं।
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